– कु. गार्गी त्यागी
बी.ए. तृतीय वर्ष
‘‘ऐ कलम तू उठ खड़ी हो कदम अपने खोल दे
है दबी हिय में व्यथा जो आज उसको बोल दे
कहते आर्यावर्त में थे धात्री जिसको मान से
पूजते ऋषि देवगण जिसको बड़े सम्मान से
स्वर्ण आभूषण थे फीके मान था इस बिन्दी से
ऐसा गहरा नाता था जन-जन को अपनी हिन्दी से
थी कार्य वो और कर्म भी
थी हाड़ वो और चर्म भी
माँ के हृदय का मर्म भी
सतित्व का सा धर्म भी
पर आज उस जया को सब तुच्छ सा है जानते
कहदे कोई हिन्दी हो तुम, अपमान सा है मानते
क्या नीति है इस विश्व की , जो उच्च है झुकता वही
छाँवों तले जिसके है सब किरणों तले तपता वही
अब उक्त है समझों जरा इसे मान दो अपना कहो
माली बन सीचो इसे छाँवो तले इसके रहो
है ज्ञान तुमको अन्य का सौभाग्य की यह बात है
पर भूलते जाओ इसे ये तो बड़ा दुर्भाग्य है
बच्चन की मधुशाला कहो या दुष्यन्त की गजल कहो
है मातृभाषा अपनी ये इससे परे न अब रहो ।।
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