– कु. शिवानी त्यागी
बी .ए. तृतीय वर्ष
सुनो उठो अब बन्धन तोड़ो ,
मातृभाषा से ना ता जोड़ो ।।
दूर हटाकर शर्म का साया, हिन्दी हैं हम गर्व से बोलो ,
चल रहे हो बन बटोही , बाट का रस्ता तो खोलो ।।
इस कदम आगे करो, दूजा कदम खुद ही बढ़ेगा ,
दूर न होगा वो दिन, हर हिन्द जब हिन्दी बनेगा ।।
लग गया है पौधा अब, यह वृक्ष भी जल्दी बनेगा ,
छाँव देगा पुष्प देगा, जल्द ही फल से लदेगा ।।
बन खड़ा हो सूर का , सागर ये गागर अब भरेगा ,
पद्मिनी के हार सा , श्रृंगार बन सुन्दर सजेगा ।।
आज हैं उत्साह मुझको, जो यहाँ मैं बोलती हूँ,
दब रहे थे भाव हिय में, वो यहाँ मैं खोलती हूँ।।
थी जगह जिसका ये मस्तक, आज वो क्यों झुक रहा है,
नाम ही था आदि जिसका अन्त अब क्यों दिख रहा है।।
रास्ता है अब यही अब एकता से नाता जोड़ो ,
सुनो उठो जब बन्धन तोड़ो , मातृभाषा से नाता जोड़ो ।।
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