– डॉ. शुभा सिंह
असि. प्रो. समाजशास्त्र
राजकीय महाविद्यालय
आँवलखेड़ा, आगरा
वर्तमान समय में तनाव शब्द लोगों के लिए नया नहीं रह गया है सामान्य बन चुका है। तनाव को अनेक शारीरिक एवं मानसिक प्रतिक्रियाओं द्वारा आसानी से चिन्हित किया जा सकता है। हैंस शैले (Hans Selye) ने ‘तनाव’ (stress) शब्द को खोजा और इसकी परिभाषा शरीर की किसी भी आवश्यकता के आधार पर अनिश्चित प्रतिक्रिया के रूप में दी।
उन्होंने दो प्रकार के तनावों की संकल्पना की –
1. यूस्ट्रेस (eustress) अर्थात मध्यम एवं इच्छित तनाव
2. विपत्ति (distress) अर्थात जो बुरा संयमित अतार्किक या अवांछित तनाव
तनाव के ही कारण उत्पन्न होते हैं द्वंद्व तथा निराशा। इसी के निवारण हेतु आवश्यकता होती है तनाव प्रबंधन की, जिसके द्वारा मानसिक तनाव में कमी लाई जाती है। यह माना जाता है कि तनाव के कारण, तनाव के परिमाण और आगे जीवन में तनाव के उत्पादन की औसत डिग्री, इन आधारों पर तनाव को वर्गीकृत किया जा सकता है।
प्रारंभ में यह अवधारणा थी के तनाव बाहरी अपमान का परिणाम है, जिसके लिए तनाव का अनुभव नियंत्रण के बाहर है। हाल ही में जैसे भी हो यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि बाह्य परिस्थितियों में किसी भी आंतरिक क्षमता में तनाव जन्म नहीं लेता बल्कि प्रभावित व्यक्ति अपने विचारों, क्षमताओं और समझ से इसकी मध्यस्थता करते हैं। परिणाम स्वरूप मानसिक बीमारियों की शिकार हो रही है युवा पीढ़ी। इसी के चलते वह अपनी जीवन लीला समाप्त करने की ओर कदम बढ़ा रही है। इसके समाधान हेतु ना केवल शासन-प्रशासन बल्कि सामाजिक पहल की भी आवश्यकता है। यदि बीते 10 वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो मानसिक तनाव के ही कारण लगभग 814 लोगों की जानें चली गई। अनेक जागरूकता कार्यक्रमों के आयोजन किए गए। राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगोष्ठी आयोजित की गई। विशेषज्ञ डॉक्टरों के अनुसार मानसिक बीमारी से सबसे ज्यादा खतरा युवा पीढ़ी पर मंडरा रहा है, युवा नशे से ग्रसित हो रहा है ,और उन में हताशा बढ़ रही है। इसमें कुछ सीमा तक परिवार भी जिम्मेदार है, जो अपने बच्चों से अत्यधिक उम्मीदें लगाकर उनके मस्तिष्क को तनाव की ओर धकेल रहे हैं। समाज के लिए तनाव के कारण उत्पन्न यह मानसिक बीमारियां किसी चुनौती से कम नहीं। आंकड़ों की मानें तो विश्व के 450 मिलियन लोग किसी न किसी रूप से मानसिक बीमारी से ग्रसित हैं, इनमें भी 16% मरीजों की आयु 10 से लेकर 19 वर्ष है। मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न बीमारियों का मुख्य कारण नशा, इंटरनेट का बढ़ता चलन तथा प्रेम में असफलता के अलावा परिस्थितियां भी होती हैं, जो सामाजिक राजनीतिक या आर्थिक कारणों से जन्म लेती हैं।
यह प्रमाणित तथ्य है कि कोई भी जन्म से तनावग्रस्त नहीं होता। उसके जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव के साथ सामंजस्य स्थापित न कर पाने के कारण व्यक्ति तनावग्रस्त हो जाता है। युवा तनाव या युवा असंतोष के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं –
बेरोजगारी –
युवाओं में विशेष रूप से शिक्षित युवाओं में तनाव का कारण पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार प्राप्त न कर पाने के कारण निराश होने पर देखा जा सकता है। माता-पिता, परिवार, रिश्तेदार तथा मित्र समूहों की अपेक्षाओं पर खरा उतर पाना उनके लिए तनाव का कारण बनता है। पढ़ाई के समय जो युवाओं को सहज प्रतीत होता है, जब वास्तविक जगत में वही सब प्राप्त करने के लिए उसे लंबा संघर्ष करना पड़ता है, तब वह धैर्य खो बैठता है और निराश हो जाता है।
भ्रष्टाचार –
जिस पर्यावरण में व्यक्ति का पालन पोषण होता है वह सामान्यतः आदर्शवादी होता है, परंतु व्यावहारिक जगत में जब वही युवा यह देखता है कि कोई भी कार्य आदर्शवादी मूल्यों के अंतर्गत संपन्न नहीं होता तथापि वह भ्रमित हो जाता है कि जो कुछ उसने अब तक सीखा और समझा वह सरल नहीं है बल्कि छोटे-छोटे कार्यो के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसे में उनकी मन: स्थिति आदर्श और यथार्थ के बीच अंतर को समझते हुए निराशावादी हो जाना स्वाभाविक है।
महंगाई –
दिन प्रतिदिन बढ़ती हुई महंगाई सामान्य लोगों के लिए दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने में किसी चुनौती से कम नहीं। ऐसे में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर पाने में असमर्थ रहने पर तनाव उत्पन्न होना आश्चर्यजनक नहीं है। महंगाई न केवल खान-पान बल्कि शिक्षा चिकित्सा व्यवसाय आदि सभी क्षेत्रों में बढ़ती जा रही है, जिससे भविष्य की सुरक्षा का प्रश्न भी उत्पन्न होता है जिससे तनाव में निरंतर वृद्धि होती जाती है।
औद्योगीकरण –
औद्योगीकरण मानव जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करता है। लोग आजीविका की तलाश में औद्योगिक संस्थाओं में कार्य करने के लिए नजर में आते हैं, जिसके फलस्वरूप अनेक समस्याओं का जन्म होता है, जैसे- पारिवारिक विघटन, मकान की समस्या, मनोरंजन की समस्या आदि औद्योगीकरण से ग्रामीण उद्योग नष्ट हो रहे हैं, जिससे ग्रामीण लोगों में तेजी से बेरोजगारी बढ़ रही है।
व्यवसायिक मनोरंजन –
मनोरंजन के वर्तमान साधनों ने भी एक ऐसे पर्यावरण का निर्माण किया है जिसमें युवा पीढ़ी अनेक तनावों का अनुभव कर रही है। टेलिविजन और चल चित्रों के आधुनिक कथानक और दृश्यों का प्रस्तुतीकरण युवा पीढ़ी को वास्तविकता से दूर ले जाता है। अभावों में पल रही युवा पीढ़ी चल चित्रों के माध्यम से जब वर्ग संघर्ष, नैतिकता के नए तरीकों, विद्यार्थियों की स्वतंत्रता तथा प्रेम प्रसंगों को देखती है, तो उनका अनुभवहीन भावुक मन इन विशेषताओं को जल्दी ही ग्रहण कर लेता है। यह काल्पनिक महत्वाकांक्षाऐं उनमें इतना तनाव भर देती है कि धीरे-धीरे वह अध्ययन से विमुख होकर आंदोलनों और हिंसा की दशा में ही कुछ चेतना और सक्रियता का अनुभव करने लगता है। मनोरंजन के व्यापारिक साधनों द्वारा जीवन मूल्यों और व्यवहार के तरीकों का प्रसारण होता है, वे व्यवहारिक जीवन से बहुत भिन्न होने के कारण युवा पीढ़ी यह तय नहीं कर पाती कि व्यवहार का कौन सा ढंग उचित है और कौन सा अनुचित। अनिश्चितता तथा भ्रम के इस वातावरण में युवा असंतोष में वृद्धि होती है।
परंपरागत एवं आधुनिक जीवन शैली –
परंपरागत जीवन पद्धति जीवन मूल्यों और जीवन शैली जिन भौतिक तकनीकी एवं सामाजिक व आर्थिक दशाओं में विकसित हुई थी वह अब काफी बदल गई है। उद्योग व तकनीकी प्रधान आधुनिक समाज की आवश्यकताएं एवं अपेक्षाएं कृषि प्रधान परंपरागत भारतीय समाज की आवश्यकता एवं अपेक्षाओं से काफी भिन्न है। ऐसे में आज के युवा के सामने एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि वह खान-पान, वेशभूषा, रहन-सहन, मेल-मिलाप तथा शादी-विवाह आदि के मामलों में परंपरागत नृत्य तथा सच्चाई ईमानदारी सादगी मितव्ययिता परोपकार जैसे परंपरागत मूल्यों को अपनाएं या आधुनिक जीवन पद्धति एवं आधुनिक मूल्यों के आधार पर जीवन में आगे बढ़े। अगर वह रहन-सहन, खान-पान, मेल मिलाप एवं शादी विवाह आदि के मामलों में स्वतंत्र निर्णय लेकर जीवन में आगे बढ़ते हैं तो उसे घर परिवार, पड़ोस और सगे संबंधियों की आलोचना के साथ कभी-कभी बहिष्कार का भी शिकार होना पड़ता है। अगर वह अपने तर्क व युक्तिसंगत निर्णय के विरुद्ध परंपरागत राह पर चलता है, तो मानसिक द्वंद्व का सामना करना पड़ता है। ऐसे में परंपरा व आधुनिकता की दुविधा युवा में मन-मष्तिष्क को इतनी उद्वेलित कर देती है कि वह तनाव का शिकार हो जाता है और परंपरा को छोड़ना नहीं चाहता और दूसरी तरफ आधुनिक जीवन की एकता से स्वयं को नहीं बचा पाता।
- अंततः तनाव का परिणाम होता है –
- समाज की कानूनी व्यवस्था भंग होना
- युवाओं की आकांक्षाओं का ढांचा लड़खड़ा जाना
- व्यक्तिगत समायोजन में असफलता
- सामाजिक मूल्यों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरण बाधित होना
- सामाजिक संस्थाओं का विघटन
- संपत्ति का नुकसान
- सामाजिक आर्थिक विकास अवरुद्ध होना
- शिक्षा व्यवस्था में विघटन
तनाव प्रबंधन सुझाव उपाय –
तनाव हर परिस्थिति में हानिकारक नहीं होता और यह भी सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति तनाव मुक्त रहना चाहता है। पूर्ण रूप से तनाव मुक्त रहना ना तो स्वाभाविक है और ना ही संभव, क्योंकि ऐसी स्थिति में व्यक्ति निष्क्रिय हो जाता है। परंतु कुछ तनाव ऐसे होते हैं जिनमें व्यक्ति को बच कर रहना लाभकारी सिद्ध होता है। तनाव को कम करने का मुख्य तरीका अपने समय का बेहतर प्रबंधन करना है। इसके अंतर्गत अपने दैनिक जीवन चर्या को सुव्यवस्थित करते हुए तनाव के लिए उत्तरदाई कारणों को नजरअंदाज करना किया जा सकता है। साथ ही नियमित व्यायाम तथा योग द्वारा सकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक विचारों का सृजन किया जा सकता है। चिंतन और ध्यान भी इसमें सम्मिलित हैं, जिससे व्यक्ति स्वयं को एवं औरों को भी बेहतर समझने में सफल हो सकता है। अपने कार्यों की प्राथमिकता का निर्धारण भी बहुत महत्वपूर्ण है। अपनी आवश्यकताओं को पहचानने तथा सामाजिक सरोकारों को शामिल करते हुए इन्हें प्राप्त करने में स्वयं को व्यस्त रखा जा सकता है। सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भागीदारी को बढ़ाकर विचारों में बुलाकर भी तनाव का नियंत्रण किया जा सकता है। अपनी परेशानियों को मित्रों के साथ साझा करते रहना भी जरूरी है। हर कार्य में उत्साहित रहे तथा उसे सर्वश्रेष्ठ तरीके से करने का अभाव रखें समय पर नींद और पर्याप्त नींद भी तनाव प्रबंधन में सहयोग प्रदान करती है अपने सभी कार्यों का लेखा-जोखा अर्थात डायरी लिखना भी वास्तविक कार्यों और मन:स्थिति को नियंत्रित करने में सहायक होती है। तनाव यदि लंबे समय तक रहे और तीव्र हो तो गंभीर बीमारियों को आमंत्रित करता है। इसलिए समय रहते तनाव के लक्षणों को पहचानना और उन पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक है। इसलिए तनाव प्रबंधन कार्य नीतियों का अनुसरण करें और अपने आप में तथा अपने से संबंधित सभी व्यक्तियों में तनाव को कम करने का प्रयास करें। प्रत्येक व्यक्ति की तनाव के प्रति प्रतिक्रिया अनन्य हो सकती है कोई एक सर्व सामान्य विधि नहीं हो सकती। जिसके प्रयोग से सभी व्यक्तियों के तनाव को प्रबंधित किया जा सके। कोई भी एक विधि सभी व्यक्तियों और सभी स्थितियों के लिए प्रभावी नहीं होती। अतः विभिन्न तकनीकों और कर नीतियों के साथ प्रयोग करते रहे इस बात पर ध्यान केंद्रित करें कि किस स्थिति में आप शांत और नियंत्रित रहते हैं।


