– कु. रश्मी गुप्ता
बी .ए. प्रथम वर्ष
जब मैनें पहली बार लिखी थी कविता
नहीं था विश्वास कि मैं कुछ कर पाऊँगी
अपने दम पर क्या कविता लिख पाऊँगी
आसमान से चाँद तारे तोड़ लाऊँगी
और उन्हें अपने घर में सजाऊँगी
क्या मैं संसार की बुराइयों को मिटा पाऊँगी
मैं अपनी कविताओं में ऐसी चेतना ला पाऊँगी
अपनी ही कविताओं से प्रेरणा पाऊँगी
आसमान की ऊँचाइयों को छूकर दिखाऊँगी
क्या मैं यह सब कुछ कर पाऊँगी
हाँ ! मैं यह सब कुछ कर पाऊँगी
और मैं कर दिखाऊँगी ।
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