‘‘नागार्जुन की कविताओं मे समाजिक चेतना’’

सुरेन्द्र कुमार पटेल
असि0 प्रोफेसर-हिन्दी
राजकीय महिला महाविद्यालय आॅवलखेड़ा

कविता और समाज में बहुत निकट का संबंध होता है। समाज की पीड़ा से ही कवि की अनुभूतियाँ काव्याकार ग्रहण करती हैं। किसी बड़े रचनाकार को अपनी रचना के लिए बुनियादी जरूरत एक विराट काव्य-संसार की होती है। ‘समाज’ कवि की अनुभूतियों की वह प्रयोगशाला है जिससे वह संवेदना को अनुभूति के साँचे में ढ़ालकर आकार देता है। नागार्जुन की रचनाएं दरअसल इसी समाज बोध की सृष्टि है। उनकी कविताओं की खासियत है उसमें धड़कता सामाजिक जन-जीवन, आशा, आकांक्षा, हताशा, निराशा की यथार्थ अभिव्यक्ति। जिसका वितान इतना बड़ा है कि उसमें ‘मनुष्य’ के अलावा प्रकृति, प्रकृति के मध्य रहने वाले जीव जंतु की जीवंत उपस्थिति है। एक तरफ नागार्जुन ‘कटहल’ को समस्त ऐन्द्रियता के साथ सामने रखते हैं दूसरी ओर ‘सुअर’ को ‘मादरे हिन्द की बेटी’ कहते हैं तथा ‘नेवला’ को अपना सहचर मानना और कहीं ‘खटमलों’ से निब्र्याज हार स्वीकार लेना नागार्जुन को प्राणि जगत का प्रेमी और जन पक्षधरता का कवि सिद्ध करता है।
नागार्जुन की कविताएं सही मायने में धूल-मिट्टी में सने निपूछल लोगों के प्रति उतने ही निश्छल ह्दय की कविताएं है। जन-अनुराग उनकी कविता की प्राण-संवेदना है। इसलिए प्रगतिवादी कवि होने के बावजूद नागार्जुन जनवादी कवि हैं। अपनी इस जनवादिता को कवि स्वंय स्वीकारता भी है-

‘‘जनता मुझसे पूछ रही है क्यूं बतलाऊँ।
जनकवि हूँ मैं साफ कहूँगा क्यों हकलाऊँ।।’’ 1

नागार्जुन के काव्य व्यक्तित्व में रंचमात्र भी बनावटीपन नहीं है। सच पूछिए तो वो कविता बनाते भी नहीं हैं ये और बात हैं कि जीवन को संुदर और दुनियाँ को बेहतर और बेहतर बनाने की कसक उनकी प्रत्येक कविता में दिखाई देती है। उनकी यही ताकत उन्हें लोकतांत्रिक बनाती है और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, और इन्दिरा गाँधी जैसी शक्तिशाली सत्ताधारियों से सवाल-जबाव करने का साहस भी देती है-

‘‘जली ठूठ पर बैठ गई कोकिला कूँक,
बा लना बाँका कर सकी शासन की बंदूक।।’’ 2

अपनी शब्द-साधना में कवि शब्दों को कई तरह से साधता है। सन्ता व समाज के मध्य चलने वाले राजनीतिक षड़यंत्र को रचनाकार साधारण शब्दों द्वारा इस तरह पर्दाफाश करता है कि आमजन का सामाजिक विवेक जागृत हो सके। ‘तीन बंदर बापू के’, ‘शासन की बंदूक’, ‘आओ रानी हम ढोएगे पालकी’ ‘हरिजनगाथा’ तमात ऐसी कविताएं है जिनका स्वर जनता को जगाने वाली और सत्ता को चिढ़ाने वाली है। ‘प्रेत का बयान’ कविता की एक बानगी देखिए-
‘‘ओ रे प्रेत-
कण्डक कर बोले नरक के मालिक यमराज
सच सच बतला!
कैसे मरा तू ?
भूख से, अकाल से, बुखार कालाजार से ? पेचिस बदहजमीं प्लेग महामारी से?
जहाँ तक मेरी अपनी बात है। तनिक भी पीर नहीं। दुःख नहीं, दुविधा नहीं।
सरलतापूर्वक निकले थे प्राण,
सह नहीं सकी आंत जब पेचिस का हमला।। 3


नागार्जुन अपनी कविताओं द्वारा सत्ता व शासन पर सीधा प्रहार तो करते ही हैं, गहरा प्रहार भी करते हैं। सच कहा जाय तो उनकी कविता सभ्यता-समीक्षा करती है। लोकतंत्र के भीतर लोक के खिलाफ चलने वाली तंत्र की प्रत्येक यंत्रणा की बारीक छानबीन तो करती ही है साथ ही सत्ता से सैकड़ों सवाल भी पूछती है। केदारनाथ सिंह अपने लेख ‘खतरनाक ढंग से कवि होने का साहस में’ कहा भी है कि-वास्तविकता यह है कि एक अत्यंत सीधी और सरल-सी दिखने वाली कविता नागार्जुन की अपनी पूरी बनावट में उतनी सरल नहीं होती जितनी समान्यतया उसे मान लिया जाता है। उनकी हर रचना के तल में एक गहरी उथल-युथल होती है और इस उथल-पुथल का भावात्मक तथा वैचारिक आवेग कही भी उस घटना या स्थान तक सीमित नहीं होता जिसका वर्णन किया जा रहा है।’’ सच है सीधी बात को सीधे ढंग से कहना उतना ही सरल है, जितना कि एक सीधी रेखा खींचना। नागार्जुन की कविताओं से गुजरते हुए अक्सर इस मुश्किल हालातों से गुजरना होता है। नदी जितनी गहरी होती है ऊपर से उतनी ही धीर और प्रशांत दिखाई पड़ती है। किन्तु भीतर बहाव का आवेग बहुत तेज होता है। ठीक वैसे नागार्जुन की कविताओं में भीतरी आवेग साफ दिखाई पड़ता है। जो कवि खुद के प्रति इतना निर्मम हो उसे दूसरों के प्रति भी निर्मम होने का पूरा अधिकार होता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि नागार्जुन इसी अधिकार के साथ आज की व्यवस्था पर प्रहार करते हैं। इस प्रहार में धार वहाँ आती है जहाँ आवेग शांत होकर व्यंग्य का रूप ले लेता है। उनका व्यंग्य जितना अनुभव सत्य है उतना ही समाजसत्य भी है। –

‘दिल्ली से लौटे हैं कल टिकट मार के।
खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के।’

इसी तरह ब्रिटेन सामग्री के भारत आने पर स्वागत की धूम-धाम देखकर कहते हैं कि-

‘‘आओ रानी हम ढोएगें पालकी।
यही हुई है राय जवाहर लाल को।’’ 4

व्यंग्य के इस पैनेपन ने नागार्जुन की कविताओं को तात्कालिक और कालजयी बना दिया वे कभी बासी नहीं हुई। और आज भी प्रासंगिक व तात्कालिक बनी हुई है। नामवर सिंह कहते भी है कि-कबीर के बाद हिंदी कविता में नागार्जुन से बड़ा व्यंग्यकार अभी तक शायद ही हुआ हो। जनता से संवाद करने का हजार ढंग उनकी कविता में मौजूद हैं। वे न तो प्रयोगवादी कवि हैं और न ही नयी कविता के बावजूद इसके कविता के रूप-विधान संबंधी जितने प्रयोग नागार्जुन ने ‘की’ उतना शायद किसी कवि ने नहीं। नागार्जुन की कविताओं की एक खास विशेषता है कि ये कलात्मक होने के साथ-साथ लोकप्रिय और लोकग्राही भी हैं। नामवर जी का कहना है-‘इस बात में तनिक भी संदेह नहीं कि तुलसी के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं की पहुँच किसानों की चैपालों से लेकर काव्य रसिकों की गोष्ठी तक है। ‘‘वे स्वाधीन भारत के प्रतिनिधि जनकवि है।’’ 5

‘अकाल और उसके बाद’ कविता में जो चित्र बिहार का वो खींचते हैं वो समग्र भारत का प्रतिरूप जान पड़ता है। इतनी छोटी सी कविता में सम्पूर्ण भारत के दुःख-दर्द को बिना मुलम्मा लगाए दर्ज कर देने का साहस और कौशल नागार्जुन सरीखे जन कवि में ही हो सकता है-

‘‘कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास ।
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास ।
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गस्त ।
कई दिनों तक चूल्हों की भी हालत रही शिकस्त ।
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद ।
धुआ उठा आंगन के ऊपर कई दिनों के बाद ।
चमक उठी घर भर की आँखों कई दिनों के बाद ।
कौए ने खुजलाई पाखें कई दिनों के बाद।’’ 6
नागार्जुन ने अनगिनत विषयों पर कविताएँ लिखी हैं। उनकी समग्र रचनाओं को एक साथ रखा जाए तो जो कोलाज बनेगा उसे सही अर्थों में ‘भारत’ कहा जा सकता है। गबई गंध नागार्जुन को बार-बार अपने गाँवों की ओर खींचती है। वे शहरी नफाशत के नहीं वरन् ग्रामीण चेतना के जन कवि है। उनकी काव्य-यात्रा में समाज का शायद ही कोई कोना हो जो काव्य रूप बनने से शेष बचा हो। लोक-धुन, लोकराग, जन-अनुराग, प्रकृति-चित्रण, किसान संवेदन जाने कितने बिम्ब चित्र नागार्जुन की कविताओं को जन सरोकारों से जोड़ देती हैं-
‘‘बहुत दिनों के बाद अबकी मैंने जी-भर देखी। पकी सुनहली फसलों की मुस्कान बहुत दिनों के बाद। अबकी मैं जी भर सुन पाया धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान। बहुत दिनों के बाद। अबकी मैंने जी भर सूँघे। मौलसिरी के ढेर-ढेर से ताजे-टटके फूल बहुत दिनों के बाद। उसकी मैं जी भर छू पाया अपनी गबई पगडंडी की चंदनवर्णी-धूल। बहुत दिनों के बाद। अब को मैने जी-भर ताल मखाना खाया। गन्ने चूसे जी-भर। बहुत दिनों के बाद। अब की मैने जी भर भोगे। गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भूपर। (बहुत दिनों के बाद) 7
एक प्रसिद्ध कवि की तरह नागार्जुन तटस्थ होकर लिखने का खतरा उठाने वाले कवि है। उनका जनवाद कही और से लिया गया या ऊपर से ओढ़ा हुआ जनवाद नहीं वरन इसी जमीन से छनकर निकला है। संस्कार भी इसी मिट्टी के हैं। उनकी जनवादी सामाजिक चेतना की विचार धारा पानी में तेल की तरह नहीं वरन पानी में दूध की तरह थी। इसीलिए खुली आँखों से सारे स्वांग पाखण्ड फरेब, छल-छद्म को देखती और चोट करती उनकी कविता सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए हर संभव कोशिश करती है। और जीवन की समस्त जटिलता को जानने, समझने और उससे दो-चार होने की बात करती है-
‘‘नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है
यह विशाल भूखण्ड आज जो दमक रहा है
मेरी भी आभा है इसमें।।’’


संदर्भ ग्रंथ-
ग्रंथ/पत्रिका संपादक/लेखक अंक/संस्करण पृष्ठ प्रकाशक

  1. आलोचना पत्रिका, नामवर सिंह सहस्त्राब्दी अंक तैतालीस पृष्ठ 59
  2. प्रतिनिधि कविताएं (नागार्जुन), नामवर सिंह तीसरा-1988 पृष्ठ 104 राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली
  3. प्रतिनिधि कविताएं (नागार्जुन), नामवर सिंह तीसरा-1988 पृष्ठ 94 राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली
  4. प्रतिनिधि कविताएं (नागार्जुन), नामवर सिंह तीसरा-1988 पृष्ठ 101 राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली
  5. प्रतिनिधि कविताएं (नागार्जुन), नामवर सिंह तीसरा-1988 पृष्ठ 10 राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली
  6. प्रतिनिधि कविताएं (नागार्जुन), नामवर सिंह तीसरा-1988 पृष्ठ 98 राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली
  7. प्रतिनिधि कविताएं (नागार्जुन), नामवर सिंह तीसरा-1988 पृष्ठ 71 राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली
  8. प्रतिनिधि कविताएं (नागार्जुन), नामवर सिंह तीसरा-1988 पृष्ठ 72 राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली

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