– कु0 उमेश
पुत्री श्री वेद प्रकाश
बी .ए. तृतीय
‘‘भरा नहीं जो भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं वह पत्थर है। जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।’’
अगाध देश प्रेम की भावना स्फुलित होती है इन्ही देश प्रेम की भावना से ओत-प्रोत होकर हमारे देश के सेनानियों ने स्वतन्त्रता की ज्वाला फैलायी तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों से वीर पुरूषों ने स्वतन्त्रता की लड़ाई में अपनी जान देकर हमें आजादी दिलाई। उनके बलिदान की संघर्षगाथा इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखित है। समय को परिभाषित करने वाले तत्वों ऐतिहासिक, राजनैतिक तथा साहित्यिक सभी क्षेत्रों से महानायक निकलकर आये और आजादी के ओर अपने कदम बढ़ाये। वीर पुरूषों का संघर्ष मृत्युपर्यन्त जारी रहा ।
ऐतिहासिक परिदृश्य सेः
ब्रिटिश सत्ता सन् 1600 ई0 में व्यापार करने के उद्देश्य से भारत आयी लेकिन उसने अपने गलत मंसूबों के चलते, जल्द ही भारत के शासन में हस्तक्षेप कर दिया । जिसका सर्वप्रथम 1857ई0 में मेरठ में मंगल पाण्डे के द्वारा बैरक पुर छावनी में विद्रोह कर दिया । इसके बाद इस विद्रोह ने तिल को ताड़ बना दिया और पूरे भारतवर्ष में यह क्रान्ति फैल गई। लखनऊ-बेगम हजरत महल, कानपुर-तात्या टोपे, बिहार फैजाबाद, आदि सभी जगह से इसका विरोध शुरू हुआ बिट्रिश शासन अपनी क्रूर रणनीतियों के चलते इन परआरोप लगाता गया लेकिन स्वतन्त्रता की आग दिल में जलाकर कभी न पीछे हटने का निर्णय करने वाले स्वतन्त्रता सेनानियों ने अंग्रेजी शासन से लोहा मनवाया । झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी । सन् 1885 ई0 में कांग्रेस की स्थापना ए.ओ. ह्यूम के द्वा रा की गई जिसने उदारवादी नीति से आजादी की मांग जारी रखी । आजादी के इस इतिहास को तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया है।
1. 1885-1905 ई0 प्रथम चरण- उदारवादी युग
2. 1905-1919 ई0 द्वितीय चरण- क्रान्तिकारी युग
3. 1919-1947 ई0 तृतीय चरण- गांधी युग
महत्वपूर्ण घटनाऐंः
1905 ई0 में अंग्रेजी सरका र ने बंगाल विभाजन कर भारतीय राष्ट्रवादी भावना को ठेस पहुँचायी । लेकिन अंग्रेजी सरकार अपने इन गलत मंसूबों पर जीत न पा सकी । उसने भारतीय राष्ट्रवादी भावना जितना तड़पाया । स्वतन्त्रता की आग उतनी ही तेज जलने लगी । इसी बीच बंगाल में आजादी का बिगुल फूँकने वाले महानायक रवीन्द्रना थ टैगोर ने आमार सोनार बंग्ला लिखकर देशभक्ति का अलख जगाया । 1916 ई0 में महात्मा गांधी के अफ्रीका से वापस आकर चम्पारण सत्याग्रह ने स्वतन्त्रता का सपना दिखाया । 13 अप्रैल 1919 जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने अंग्रेजी सरकार के विचारों का पर्दाफाश कर दिया । भारतीय जनता एकजुट हो कर आजादी के कुरूक्षेत्र में अपनी जान की बाजी लगाने के लिए तैयार हो गई। 1920-1922 असहयोग आन्दोलन महात्मा गांधी द्वारा चलाया गया । जो भारतीय जन आन्दोलन था । 5 फरवरी 1922 चौरी -चौरा काण्ड गोरखपुर, जिसमें अंग्रेजी सरकार को सबक सिखाने हेतु एक पुलिस चौकी को 22 पुलिसकर्मि यों सहित जिन्दा जला दिया । 1942 ई0 भारत छोडो आन्दोलन-अन्ततः गांधी जी ने ‘करो या मरो ’ का नारा देकर भारतवसि यों को स्वतन्त्रता की आग में कूद पड़ने को प्रेरित किया और भारतीय जनता की कड़ी तैयारी और प्रतिशो ध को देखकर अंग्रेजी सरकार के पैर उखड़ने लगे। उसने 15 अगस्त 1947ई0 को भारतवासियों को उनका स्वतन्त्र राष्ट्र देकर अलविदा कह दिया । भारत दो राष्ट्र हिंदुस्तान व पाकिस्तान में विभाजित हुआ।
‘‘देखकर साहस भारत माँ के वीरों का घबराने लगे शासक बिट्रिश के।
लोहा मानकर कर भारतीयों के अदम्य साहस का ब्रिटिश शासक ने सर धर दिया उनके पैरों तले।।’’
राजनैतिक परिदृश्यः
1885ई0 में कां ग्रेस की स्थापना से ब्रिटिश सरकार अपने ‘फूट डालो राज करो ’, अपगत सिद्धान्त आदि अनेक प्रकार से भारतीय जनता को प्रताड़ित करती थी । कांग्रेस इन सभी प्रकार के सिद्धान्तों और नीतियों पर कड़ा तमाचा साबित हुई। कांग्रेस अपनी योजनाओं और विभिन्न अधिवेशनों में ‘स्वराज्य की मांग’ रखती गई। इसी प्रका र सन् 1942 में क्रिप्स मिशन आया जिसने कांग्रेस को स्वतन्त्रता के बारे में मनाया लेकिन वह अपने प्रण पर अडिग रही । भारत के बाहर विदेशों में भी भारतीयों ने स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु अलख जगाये। सैनफ्रासिस्कों में गदर पार्टी की स्थापना: 1930 ई0 प्रथम गोलमेज सम्मेलन, 1931 ई0 द्वितीय गोलमेज सम्मेलन जिसमें कांग्रेस की तरफ से गांधी ने भाग लिया । लेकिन उनकी एक भी मांग नहीं सुनी गई। 1932 ई0 तृतीय गोलमेज सम्मेलन: 1947 ई0 में 15 अगस्त को कड़े संघर्ष के बाद आजादी मिलने पर 9 नवम्बर 1948 ई0 को भारतीय संविधान सभा की प्रथम बैठक हुई और 2 साल 11 मही ने 18 दिन की कड़ी मेहनत कर भारत का अपना संविधान 26 नवम्बर 1949 ई0 को अंगीकृत किया गया । जिसके स्थायी अध्यक्ष डॉ 0 राजेन्द्र प्रसाद थे। तथा भारतीय संविधान के निर्माता डॉ0 भीमराव अम्बेडकर जी थे।
साहित्यिक परिदृश्यः
जितना संघर्ष स्वतन्त्रता में ऐतिहासिक व राजनैतिक में वीरों का था, उतना ही संघर्ष वीरों की कलम ने आजादी पाने के युद्ध में किया । कवि, लेखकों व साहित्यकारों ने अपने विचारों की तलवारों से अंग्रेजी सरकार की शोषण व दमनकारी नीतियों को उखाड़ फेंका ।
कुछ प्रमुख पत्रिकाएं व पुस्तकें :
1. सोजे वतन- प्रेमचन्द
2. संवाद कौमुदी – राजा राममोहन राय
3. न्यू इंडिया – एनी बेसेन्ट
4. मराठा केसरी – बाल गंगाधर तिलक
5. इण्डियन मिरर- राजा राममोहन राय
धार्मिक परिदृश्यः
भारत की रूढ़िवादिता, अन्धविश्वास तथा अन्धभक्ति को मिटाने के लिए महान धार्मिक आन्दोलन व धार्मिक सुधार हुए।
1875- ब्रह्म समाज- राजा राममोहन राय
आर्य समाज- दयानन्द सरस्वती
उपसंहारः
‘‘मर के भी जीते रहे, वो वीर भारत माँ के थे।
आजादी के आग में कूद पड़े वो वीर भारत माँ के थे।
ना झुके ना झुकने देगें सर हिमालय का, सर कटा देगें
सीने पर लहरायेगा तिरंगा भारत का ।’’
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