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जिन्दगी अनजाने शहर में – प्रतिभा

जिन्दगी अनजाने शहर में

– प्रीती बाला सागर
बी.ए. तृतीय वर्ष

उद्देश्यः – इस कविता को लेखिका ने बिहारी मजदूरो को सम्बोधित करते हुए लिखा है।
क्योंकि जब एक मजदूर अपने गाँव को छोड़कर काम की तलाश में शहर में जाता है तो वह
अपने मन में कई सपने लेकर शहर में जाता है, लेकिन जब वह शहर जाता है तो उसके सपनों
पर पानी फिर जाता है तब एक मजदूर क्या महसूस करता है? वह इस कविता में दिखाने का
प्रयास किया गया है।

कि यूँ ही गुजर रही है, जिन्दगी इस अनजाने शहर में।
ठोकर खा रही है किस्मत इस अनजाने शहर में।।
ना दुआओं का असर है इस अनजाने शहर में।
ना भलाई का मोल है इस अनजाने शहर में ।।
मिले अगर खुद से, इस अनजाने शहर में।में
तो पूछेंगे क्या हाल है, इस अनजाने शहर में।।
दिनभर अकेला घूमता हूँ अपने ख्वाहिशों के महल में।
घर तो मेरे छीन लिया इस अनजाने शहर में।
हँसते गाते कट रही थी जिन्दगी मेरी गाँ व में।
महलों को क्यों आया तलाशने इस अनजाने शहर में।।
जिन्दगी का काफिला है, इस अनजाने शहर में।
मौत का शमशान कहाँ है इस अनजाने शहर में।।
धीरे-धीरे कट रही है, जिन्दगी इस अनजाने शहर में।
ठोकर खा रही है किस्मत इस अनजाने शहर में।।

****

pratibha

combined e-magazine for session 2019-20, 2020-21, 2021-22 published by Mata Bhagwati Devi Rajkiya Mahila Mahavidyalay

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